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By The Lallantop · 466 caption lines · Watch on YouTube
बीती हुई रात कयामत की रात थी। खतरा मानव जाति के लिए ऑक्सीजन से भी ज्यादा जरूरी बन चुके इंटरनेट पर आया था और अभी भी पूरी तरह टला नहीं है। पूरी दुनिया सावधान हो गई है क्योंकि सवाल हमारे आपके और हम सबके डाटा का है जो कुछ लोगों के लिए आटा से भी ज्यादा जरूरी बन चुका है। एआई ने अब ऐसी गड़बड़ी का पता लगाया है जिससे सिर्फ सरकारी नहीं बल्कि आपका और हम सबका पूरा डाटा बैंकिंग रिकॉर्ड्स पैसे आईडी पासवर्ड सब कुछ चोरी हो सकता है। यह इतना खतरनाक है कि दुनिया की तमाम सरकारों और बड़ी कंपनियों ने डर के मारे अपनी वेबसाइट्स बंद कर दी हैं। क्या है यह खतरा और कहां से आया और कैसे इसे ठीक किया जा सकता है?
आज इसी पर बात करेंगे। नमस्ते, मैं हूं कुलदीप और आप देख रहे हैं ललन टॉप का अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों से जुड़ा रोजाना का कार्यक्रम दुनियादारी। ब्रॉट यू बाय टीवीएस आईक्यू। आईक्यू इज इंडियास फेवरेट फैमिली। आप बताइए यह नंबर वन क्यों है? बिकॉज़ ऑफ़ नाश्ता ऑन द हिल्स। हर फैमिली का नंबर वन फेवरेट टीवी यानी आईक्यू। 20 अक्टूबर को अचानक से इंटरनेट के किसी कोने में एक खबर लीक होती है। खबर यह कि इंटरनेट के सर्वर्स में एक बड़ी तकनीकी खराबी पकड़ी गई है। ऐसी खराबी जो पूरी दुनिया पर असर डाल सकती है। यह खबर पहले हैकर न्यूज़ नाम की एक वेबसाइट पर आई। इसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर फैलने लगी और देखते ही देखते इंटरनेट की दुनिया में खलबली मच गई। फिर वेबसाइट्स ऑफलाइन होने लगती हैं एक-एक करके। फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, फिनलैंड जैसे देशों ने अपने यहां की सरकारी वेबसाइटें बंद कर दी।
आप छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी रिसर्च के लिए जिस विकपीडिया का इस्तेमाल करते हैं, उसने भी अपने सिस्टम्स बंद करने शुरू कर दिए। नेदरलैंड्स में तो साइबर सिक्योरिटी की एजेंसी ने ही अपनी वेबसाइट बंद कर दी। Facebook से लेकर Amazon तक दुनिया भर की वेबसाइट्स के लिए इमरजेंसी अलर्ट जारी किए जाने लगे। चेतावनी जारी की जाने लगी कि वेबसाइट या तो सुधार लीजिए या उसे बंद कर लीजिए। खुद Google की साइबर सिक्योरिटी कंपनी ने कहा कि यह सॉफ्टवेयर पर आए अब तक के सबसे बड़े खतरों में से एक है। पर हुआ क्या था? इतना हंगामा अचानक क्यों हुआ? शुरू से समझते हैं। ओपन एआई आप जानते हैं चाहे जीपीटी बनाने वाली कंपनी।
इसने जुलाई में एक पहल की जिसका नाम था पैच द प्लेनेट। इसका मकसद था एआई के जरिए सॉफ्टवेयर्स में वो कमियां, वो खामियां ढूंढना जो आमतौर पर इंसान की पकड़ में नहीं आती। खासकर ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर में यानी जिन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हर कोई कर सकता है। अब कैलिफ नाम की एक अमेरिकी कंपनी है जो साइबर सिक्योरिटी से जुड़ी हुई है। इस कंपनी ने चाइल्ड जीबीटी के 5.6 साल मॉडल की मदद से पीएपी के अंदर एक बड़ी गड़बड़ी पकड़ी। पीएचपी क्या है? वो समझ लेते हैं। ज्यादा टेक्निकल जानकारी से आप बोर ना हो। इसलिए बुनियादी चीज समझ लीजिए।
बस पीएपी एक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है। जैसे C++ होती है, जावा होती है जो सर्वर पर चलती है और बैक एंड पर काम करती है और इसका काम है किसी भी वेबसाइट के डेटाबेस पर जाकर के वहां से इंफॉर्मेशनेशन जानकारी इकट्ठा करके आप तक पहुंचाना। जब आप किसी वेबसाइट पर लॉगिन करते हैं तो आपके यूजर आईडी और पासवर्ड को पीएपी वेबसाइट के डेटाबेस से ही मैच करता है। फिर उस वेबसाइट पर आपकी व्यक्तिगत जानकारी आपको दिखाता है। जैसे आपने कोई शॉपिंग वेबसाइट पे लॉग इन किया तो प्रीवियस ऑर्डर तभी दिखेगा। यह सब बैक एंड में हो रहा होता है। इसलिए पीएपी से सीधे आपका कोई लेना देना होता नहीं। कोई राब्ता डायरेक्ट नहीं पड़ता है। अब पीएपी एक फ्री और ओपन सोर्स लैंग्वेज है। यानी इसका कोई एक मालिक नहीं है। दुनिया भर के कुछ होनहार डेवलपर्स ने मिलकर के इसे मैनेज करने के लिए द पीएपी ग्रुप नाम की एक संस्था बनाई हुई है।
डेवलपर्स इसमें वंटरीली अपनी मर्जी से जुड़े रहते हैं। दुनिया की कई बड़ी कंपनीज़ इस संस्था को फंड देती हैं जिससे डेवलपर्स का खर्च चले। यह पीएपी इतना अहम क्यों है? वो इसलिए क्योंकि दुनिया भर की 70% से ज्यादा वेबसाइट इसी पर चलती हैं। इसमें Facebook और Amazon से लेकर विकपीडिया भी शामिल है जिसका आप और हम रोजाना इस्तेमाल करते हैं लाखों करोड़ों लोग। इसके अलावा वर्डप्रेस भी इसी पीएपी से चलता है जिसका इस्तेमाल वॉग्स में किया जाता है।
वेबसाइट्स के कंटेंट मैनेजर के तौर पर भी इसका इस्तेमाल होता है। ऐसे समझिए कि किसी वेबसाइट का प्लेटफार्म होता है जिस पर वो ऑपरेट कर रही होती है। दुनिया भर की लगभग 40% वेबसाइट इसी वर्डप्रेस से बनी है। ध्रुपल नाम का वेब प्लेटफार्म भी इसी पीएपी पर चलता है। दुनिया भर की कई सरकारी वेबसाइट्स के लिए इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में 391 सरकारी वेबसाइट्स इसी ड्रपल पर चलती हैं। तो अब आप यह समझे होंगे कि पीएपी क्या है और क्यों जरूरी है 70% ऑफ ग्लोबल इंटरनेट। अब आते हैं खबर पर। तो साइबर सिक्योरिटी फर्म कैलिफ ने 11 अगस्त को पीएपी में एक बग ढूंढा। बग यानी सॉफ्टवेयर में कोई तकनीकी खराबी। बताया गया कि इस बग के जरिए कोई भी हैकर कुछ कमांड्स से पीएपी सर्वर को हैक कर सकता है और इससे वो पीएपी से चलने वाली वेबसाइट्स को भी एक्सेस कर सकता है। बिना किसी लॉगिन पासवर्ड के उन वेबसाइट में मौजूद डेटाबेस तक पहुंच सकता है। इससे दुनिया भर के इंटरनेट यूज़र्स के डेटा पर सीधा खतरा हो गया। यूजर आईडी पासवर्ड पर सीधा खतरा हो गया। कांटेक्ट डिटेल्स और एड्रेस पर भी। बताया गया कि यह पीएचपी में गड़बड़ी कोई आज की नहीं थी
बल्कि 20 साल से यह बैठी हुई थी गड़बड़ी लेकिन इसे पहचानना बहुत मुश्किल और जटिल था इंसानी आंखों के लिए। कैलिफ के सीईओ थाई डओ ने वॉलस्ट्रीट जर्नल को बताया है कि दशकों पहले एक सिक्योरिटी रिस्चर ने इस गड़बड़ी को पकड़ा था और इसके बारे में बताया भी था। लेकिन तब इसे इतना मुश्किल माना गया कि इसका फायदा उठाना लगभग नामुमकिन समझा गया। लेकिन इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया और लोग इस बारे में भूल गए। यानी इंटरनेट के सर्वर में 20 साल से इतनी बड़ी गड़बड़ी बैठी हुई थी और किसी को भनक नहीं थी। जानकारों का कहना है कि एआई की वजह से ही यह गड़बड़ी पकड़ में आई। लेकिन जाहिर तौर पर यह सभी जानकारियां तब बाहर नहीं आई थी, अब आई हैं। तभी हम आपको इसके बारे में अब बता रहे हैं। तो 11 अगस्त को इस गड़बड़ी का पता चलने पर कैलिफ ने इसकी जानकारी पीएचपी मैनेज करने वाली संस्था को दी। लेकिनकि यह गड़बड़ी बहुत बड़ी थी और बाहर आ जाती तो हैकर्स इसकी मदद से वेबसाइट्स को हैक कर सकते थे तुरंत।
इसीलिए यह तय किया गया कि इसकी जानकारी तब तक बाहर नहीं आने दी जाएगी जब तक इसका कोई स्यूशन कोई समाधान नहीं निकाल लिया जाता। इसके बाद 24 अगस्त को Google की साइबर सिक्योरिटी कंपनी विज़ ने भी अलग-अलग रिसर्च में उन्हीं बग्स को ढूंढ निकाला। विज़ ने भी पीएपी को इसकी रिपोर्ट दी। विज़ ने बताया कि उसने Google AI जेमिनाई के चार एयरगन फोर एयरगन मॉडल और जीपीटी 5.6 सोल की मदद से इसे ढूंढा। फिर इस बग और इस पूरी गड़बड़ी को पीएपी टू शेल नाम दिया गया। पीएपी टू शेल। यह याद रखिएगा आगे भी इसका संदर्भ आएगा। इसके बाद भीतरखाने शुरू हुई इस गड़बड़ी को ठीक करने की जद्दोजहद।
कैलिफ, विज़ और खुद ओपन एआई की टीम्स भी इसकी रिसर्च में लग गई। बग का सिक्योरिटी पैच बनाया जाने लगा। लेकिन इसमें समय लगना था। सिक्योरिटी पैच यानी यह समझिए कि एक कपड़ा अगर फट गया है तो रफू करने के लिए वो कपड़ा सिला जाना है। तो फैसला यह लिया गया कि 22 अक्टूबर तक इस सिक्योरिटी पैच को रिलीज़ कर दिया जाए और उसी दिन पूरी दुनिया को इस गड़बड़ के बारे में बताया जाए। लेकिन यह प्लान ऐन मौके पर आकर के फेल होने लगा। सबसे पहले 17 अक्टूबर को Amazon के एक नकली टारगेट सर्वर पर एक साइबर अटैक हुआ। बताया गया कि हैकर ने उसी पीएपी टू शेल बग का इस्तेमाल करने की कोशिश की यानी किसी तरह इस गड़बड़ी के बारे में हैकर्स को पता चल गया था। फिर 20 अक्टूबर तक आते-आते इस गड़बड़ी की खबर सोशल मीडिया और न्यूज़ वेबसाइट्स पर फैलने लगी। यानी खबर बाहर आ चुकी थी या कहें कि लीक हो गई थी। आनन-फानन में पीएपी ने इमरजेंसी अलर्ट जारी किया। माना कि उसके सिस्टम में गड़बड़ी पकड़ी गई है। इसके बाद पीएपी ने 21 अक्टूबर यानी पहले से तय 22 अक्टूबर से एक दिन पहले इन बग्स के सिक्योरिटी पैचेस रिलीज़ कर दीजिए। कर दिए कि भैया आप इन्हें डाउनलोड कर लीजिए तो यह
रफू आपका हो जाएगा। लेकिन तब तक गड़बड़ी का फायदा उठाए जाने की कोशिश शुरू हो चुकी थी। कई छोटी-बड़ी वेबसाइट्स पर इस बग के जरिए साइबर अटैक की खबरें आई हैं। दुनिया भर में हो हल्ला मचा हुआ है क्योंकि अचानक से लाखों करोड़ों वेबसाइट्स पर हैकिंग का खतरा पैदा हो गया है। और यह साइबर खतरा कितना बड़ा है यह बताने के लिए पैमाना है सीवीएसएस सीवियरिटी स्केल कितना सीवियर है। इसमें इसे 10 में से 9.2 स्कोर दिया गया। यानी बेहद खतरनाक स्तर का खतरा। इस बग के जरिए कोई भी हैकर सिस्टम के डेटाबेस तक पहुंच सकता है। लाखों करोड़ों लोगों का सेंसिटिव डाटा खतरे में है। इसमें एक बड़ा खतरा एआई का भी है। पहले भले ही ऐसे बग के जरिए आसानी से हैकिंग नहीं हो पाती लेकिन आज एआई ने जैसे बग ढूंढना आसान किया है।
हैकिंग करना भी आसान बना दिया है। पहले हैकिंग के लिए जो एक्सपर्टीज लगती थी, जो समय लगता था, वो एआई अब तुरंत सिखा देता है और घंटों के काम को सेकंड्स में कर देता है। इसलिए किसी भी बड़े बग और सुरक्षा खतरे से जल्दी से जल्दी निपटने की जरूरत अब होती है। लिहाजा तुरंत ही इससे बचने के कदम उठाए जाने लगे। दुनिया भर की साइबर सिक्योरिटी एजेंसीज हरकत में आई। दुनिया भर के राष्ट्र अध्यक्ष कई देशों के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ट्वीट किए हैं इसके बारे में। सबसे पहले पीएपी यूज़ करने वाली सभी वेबसाइट से कहा गया कि डेवलपर्स ने जो पैच रिलीज़ किए हैं उन्हें तुरंत सॉफ्टवेयर में अपडेट कर लें। लेकिन ये तुरंत होने वाली चीज नहीं है। हजारों लाखों वेबसाइट्स को अपडेट करने में समय तो लगेगा ही। ऐसे में अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी ने कहा कि अगर आप सिस्टम को तुरंत अपडेट नहीं कर सकते अभी तो फिलहाल उसे ऑफलाइन कर दें यानी अपनी वेबसाइट्स बंद कर दें। एजेंसी ने कहा कि यह खतरे इतने गंभीर हैं कि अमेरिकी सरकार के सभी विभागों और एजेंसियों को तुरंत पैचिंग करने की जरूरत है। यूके, यूरोपियन यूनियन, ऑस्ट्रेलिया, इंडिया सभी देशों में साइबर एजेंसीज ने इसी तरह के अलर्ट
जारी किए। हमने जो ऊपर आपको बताया था कि यूरोप के देश अपनी सरकारी वेबसाइट्स बंद करने लगे। वो इसी हैकिंग से बचने के लिए ही था। जापान की प्रधानमंत्री सनाय ताकाईची ने भी 21 अक्टूबर को एक्स पर पोस्ट किया। उन्होंने लिखा कि अगर आपकी पब्लिक वेबसाइट्स पीएपी से चलती हैं तो आज रात 11:00 बजे रिलीज होने वाले फिक्स पैच को जल्द लागू कर लें। यदि ऐसा नहीं कर पा रहे तो रिस्क कम करने के लिए अपनी वेबसाइट्स को कुछ समय के लिए बंद कर दें।
हम सभी से अपील करते हैं कि वो आज रात ही इस पर एक्शन लें। सवाल है कि इस पूरे मामले का भारत पर क्या असर हो सकता है? भारत में भी सरकारी विभागों, कंपनियों, दूसरी संस्थाओं की बहुत सारी वेबसाइट्स हैं। इनमें से कई वेबसाइट्स पीएसपी जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती हैं। भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी सीईआरटी इन यानी इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम ने भी 21 अक्टूबर को पीएपी की इन खामियों को लेकर के चेतावनी जारी की। सर्ट इन का काम देश में कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े सेफ्टी के खतरों पर नजर रखना है और उनसे बचने के लिए सलाह देना है। इसलिए भारत में भी जिन संस्थानों के सर्वर में ये खामियां मौजूद है पीएपी वाली उन्हें अपने सिस्टम की जांच करके जल्द से जल्द अपडेट करने की जरूरत है। यानी सरल शब्दों में कहें तो चाहे आप सोशल मीडिया पर दोस्तों से बात कर रहे हैं। ई-कॉमर्स ई-कॉमर्स पर आप शॉपिंग कर रहे हैं। किसी सरकारी पोर्टल पर आपने अपनी निजी जानकारी डाल रखी है। अनजाने में आप हर वक्त इसी पीएचपी के ही सुरक्षा घेरे में होते हैं और इसी सुरक्षा घेरे में एक बड़ा छेद हो चुका है। चुनौती यह है कि उन हजारों लाखों वेबसाइट्स को तुरंत अपडेट
करने की जरूरत है जो पीएपी का इस्तेमाल करती हैं। यह वेबसाइट्स को अपने लेवल पर ही करना होगा। समस्या यह भी है कि एक बग का पैच मिल भी गया तो हैकर एआई की मदद से उसका भी तोड़ निकाल सकते हैं। तो लगातार पैचेस की जरूरत पड़ेगी और उन्हें लगातार अपडेट करते रहना होगा। कई पैबंद लगाने होंगे जो एक मुश्किल काम है। एक बात और है कि बड़ी ऑनलाइन कॉमर्स साइट्स जो हैं या बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जो हैं वो तो अपडेट कर लेंगे क्विकली बट जो छोटी वेबसाइट्स हैं जहां से आपने कभी कोई टीशर्ट मंगाई थी, कोई जूता मंगाया था।
गारंटी नहीं है कि वो टाइमली अपग्रेड करेंगे या नहीं। यानी कि कुछ वेबसाइट्स हो सकता है कि रिस्क पर रहें ही। ऊपर से यूजर को यह नहीं पता कि कौन-कौन सी वेबसाइट्स खतरे में है। उनका डाटा सुरक्षित है या चोरी हो गया है या हो सकता है। कितनी वेबसाइट इसकी जद में है। नुकसान कितना हो सकता है या ऑलरेडी कितना हो चुका है? ये खतरा कितना बड़ा है? ये सारे सवाल अभी भी बने हुए हैं जवाब जानने के लिए। हमने एक्सपर्ट से बात की। सबसे बड़ा इंपॉर्टेंट चीज है आज की डेट में हम सब कुछ सब लोग इंटरनेट में जुड़े हुए हैं। आप सुबह उठते हुए रात तक आप कहीं भी इंटरेक्ट कर रहे हो। हॉस्पिटल चले जाओ एजुकेशन सिस्टम बैंक चले जाओ फ्लाइट चेक करो कहीं जा रहे हो आपका सब कुछ एक डिजिटल पैरेलल वर्ल्ड चल रहा है आज अगर हम हम एज एन एग्जांपल दिखाऊं कि रियल वर्ल्ड में आप सोचो कि दुनिया से बाहर से स्पेस से एक कॉमिट आ रहा है और ये हिट करने वाला है आर्ट को इट इज डमिनिंग इट इज सो स्केरी सेम आप सोचो डिजिटल वर्ल्ड में हुआ है ये तो अब क्या हो रहा है आप एआई ह्यूमन असिस्ट लेके एआई को यूज़ करा जा रहा है। ये सब चीजों को ढूंढना। साथ में साथ हैकर्स भी वही चीज कर
रहे हैं। वो भी वही एआई असिस्टेड चीज लेके वो हैकिंग करने का कोशिश चल रहा है। और मैं ये देख रहा हूं कि आपको पता नहीं होगा कि पता नहीं मुझे पता नहीं कि रिस्चर हैज़ फाउंड 50000 वेबसाइट्स एंड 159 गवर्नमेंट एसेट्स इंडियन एसेट्स ऑल इंडियन नंबर्स आर ऑन रिस्क। इनके ऊपर बहुत रिस्क है। 159 गवर्नमेंट एसेट्स एंड 50000 इंटरनेट एसेट। और यह बहुत बड़े एक खतरनाक चीज है। ये आप दुनिया खत्म कर सकते हो। कंट्री खत्म कर सकते हो इंटरनेट टेक ओवर करने। तो मेरे हिसाब से आज की डेट में जो वर्ल्ड वॉर डिजिटल में चल रहा है वो डिजिटल वॉर में एआई इज अ वेपन। एआई इज अ स्मार्ट ब्रेन वेपन। जो लोग यह यूज करे जा रहे हैं और उसको प्रोटेक्ट करने के लिए भी आप देखो ह्यूमन बीइंग अब आदमी और मशीन में बहुत अंतर आ गया। अब वो मशीन सोचने लगा है और उस मशीन को रोकने के लिए मुझे भी अपना एआई यूज करना पड़ेगा। तो आज एआई वर्सेस एआई चल रहा है और पीछे यह जो रचाया जा रहा है सब कुछ यह हम लोग रच रहे हैं द गुड वर्सेस इवन और इसका फ्यूचर यही होगा कि हमें इमीडिएटली इमीडिएटली आई थिंक वो लोग कर रहे होंगे जो पैचेस चाहिए होता है सिक्योरिटी पैचेस मेरे हिसाब से यह और भी
होता जाएगा ये शुरुआत है आप जो आज देख रहे हो आप हो सकता है पहली बार हो रहा है तो हमें लग रहा है ये क्या हो बट यह और खतरनाक होता जाएगा। यह लड़ाई और खतरनाक और ये इसमें आप देखोगे ह्यूमन लाइफ लॉस, इंफ्रास्ट्रक्चर लॉस, कंट्री फेसिंग प्रॉब्लम ये सब कुछ होगा। और इसके बचने का एक ही उपाय है। अगर एआई अटैक एआई यूज़ करके अटैक कर रहे हैं हम तो एआई से हमें बचना पड़ेगा। बड़ी खबर यहीं तक। अब बारी है सुर्खी की। तुर्की, पाकिस्तान, कतर और इंडोनेशिया ने सैन्य सहयोग बढ़ाने और अपनी डिफेंस कैपेबिलिटीज को मजबूत करने के लिए एक नए समझौते पर दस्तखत किए हैं। चारों देशों ने 21 अक्टूबर को दोहा में इस समझौते पर साइन किए। उनका मकसद चारों देशों की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना।
डिफेंस का उत्पादन यानी कि जो डिफेंस के इक्विपमेंट होते हैं उन्हें घर पर बनाना। सैन्य प्रशिक्षण और रिसर्च के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना है। इसे बद्र मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग बद्र समझौता कहा गया है। यह नाम 624 ईवी में हुई जंग बद्र से लिया गया है और इस लड़ाई में पैगंबर मोहम्मद और उनके शिष्यों ने अरब पेनिनसुला की शुरुआती इस्लामी लड़ाइयों में से एक अपने विरोधियों को हराया था। समझौते के जरिए चारों देश अपनी-अपनी एक्सपर्टीज को एक साथ लाना चाहते हैं। मकसद है कि रक्षा उत्पादन में सहयोग बढ़ाना, एडवांस डिफेंस टेक्निक को डेवलप करना। तुर्की के पास नेटो के की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। उसकी डिफेंस इंडस्ट्री भी मजबूत है। कतर के पास ऐसे समझौतों में पैसा लगाने की इन्वेस्टमेंट की क्षमता है। इंडोनेशिया को दूसरे देशों के साथ मिलकर रक्षा उपकरण बनाने और अपने देश में उनका प्रोडक्शन करने का अनुभव है और पाकिस्तान के पास भी उत्पादन क्षमता है। कामगारों का एक बड़ा वर्ग है और हथियारों का भी वह एक बड़ा बाजार है। इस समझौते का समय भी काफी अहम है। यह ऐसे वक्त हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग को 8 महीने हो गए हैं। सऊदी अरब और
हुतियों के बीच संघर्ष ने भी सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। इसी बीच अमेरिका के पास हथियारों की कमी का मुद्दा भी सामने आया है। इसकी वजह से पश्चिम एशिया के देशों में अपने सुरक्षा इंतजाम पुख्ता करने और ऐसे रक्षा समझौते करने की जल्दबाजी बढ़ी है जिनसे वो अपनी रक्षा के लिए दूसरे देशों पर अपनी डिपेंडेंसी, अपनी निर्भरता कम कर सकें। अब सवाल आता है कि भारत के लिए क्यों जरूरी यह अहम है? इसकी वजह है कि इससे पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य ताकत दिखती है। फिलहाल पाकिस्तान अपने हथियारों के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर है। लेकिन भद्र समझौते के बाद पाकिस्तान के पास हथियारों और सैन्य तकनीक के लिए दूसरे देशों के साथ सहयोग बढ़ाने का ऑप्शन भी होगा। इसके अलावा इंडोनेशिया वाला पहलू भी भारत के लिए अहम है। सवाल यह है कि क्या भद्र समझौते से भारत और इंडोनेशिया के बीच हुआ रक्षा सौदा खतरे में पड़ सकता है? जुलाई में भारत और इंडोनेशिया ने 63 करोड़ डॉलर के एक समझौते का ऐलान किया था और इसके तहत भारत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल और अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें देने वाला था। अब चिंता यह जताई जा रही है कि भद्र समझौते
के तहत चारों देश आपस में हथियारों से जुड़ी तकनीकी जानकारी शेयर कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो पाकिस्तान को भारत के हथियारों के बारे में जानकारी मिल सकती है। हालांकि डीआरडीओ के चेयरमैन एमिरेटस और ब्रह्मोस एयर एयररोस्पेस के पूर्व महानिदेशक सीईओ और एमडी सुधीर कुमार मिश्रा ने इस आशंका को खारिज किया है। उन्होंने कहा है कि इंडोनेशिया के साथ रक्षा समझौते सुरक्षा उपायों के साथ किए गए हैं। इसमें सिर्फ हथियार का इस्तेमाल करने की यूजर यूजर मैनुअल साझा की जाएगी।
तकनीक की अदला बदली नहीं होगी। लेकिन पाकिस्तान की नई डील पर फिर भी भारत की नजर तो बनी ही रहेगी। सऊदी अरब में 21 अक्टूबर को देर रात एक एयरपोर्ट और एक तेल ठिकाने पर हमला हुआ इसमें एक भारतीय समेत तीन लोगों की मौत हो गई। 10 लोग घायल हुए हैं जिसमें तीन भारतीय हैं। दम्माम शहर के किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमले में एक भारतीय की मौत हुई। वहीं आरामको के तेल ठिकाने पर ड्रोन हमले में नेपाल और फिलीपींस के एक-एक नागरिक की जान गई। इस महीने हुती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर छह बड़े हमले किए हैं। इनमें कम से कम 23 की मौत हुई है और 370 घायल हुए हैं। दमाम फारस की खाड़ी के तट पर स्थित है। बहरीन और क़तर के करीब है यह। दुनिया भर की उड़ानों पर नजर रखने वाली वेबसाइट फ्लाइट रडार 24 ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर बताया कि हमले के बाद विमानों को दूसरे रास्ते से भेजा जा रहा है। इस बीच अमेरिका ने अपने कुछ डिप्लोमेट्स और सरकारी कर्मचारियों को भी सऊदी अरब छोड़ने को कह दिया है। अगली खबर भारत ने यूएन की एक रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई है। इसमें अंडरवर सरगना दाऊद इब्राहिम के गिरोह डी कंपनी को भारत में मौजूद अपराधी संगठन
बताया गया है। इंडिया बेस्ड बताया गया है। भारत ने कहा कि यह बात गलत है और इसके कोई भी सबूत रिपोर्ट में नहीं दिए गए हैं। ऐसी गलतियों से संयुक्त राष्ट्र की छवि को नुकसान पहुंचता है। यह रिपोर्ट बनसोल ने जुलाई 2026 में तैयार की थी। अक्टूबर 2026 में यूएनजीए संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान इसे पेश किया गया। बनसोल ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर हैं। उन्हें मिलने वाली आर्थिक मदद को लेकर के भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि चीन की सरकार ने 2024 में सोल को $.5 लाख दिए थे।
रिपोर्ट में चीन को उनका सबसे बड़ा आर्थिक मददगार बताया गया है। यूएनजीए की तीसरी समिति की बैठक में 21 अक्टूबर को भारत के प्रतिनिधि रघुपुरी ने यह मुद्दा उठाया। भारत ने रिपोर्ट के उस हिस्से पर सवाल उठाया जिसमें कहा गया था कि यूएनएससी ने 2003 में अलकायदा से संबंधों के कारण भारत में मौजूद डी कंपनी के सरगना को अपनी पाबंदियों की लिस्ट में शामिल किया था। रघुपुरी ने कहा कि डी कंपनी को भारत में मौजूद संगठन बताने से लोगों के सामने गलत तस्वीर जाती है। दाऊद इब्राहिम और उसका गिरोह 1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़े मामलों में भारत में वांटेड है। तो आज का दुनियादारी यहीं समाप्त होता है। अपना और अपनों का ख्याल रखिए। टेल एंड टॉप देखते रहिए। शुक्रिया। शुभ रात्रि।